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रोज़ा जुबान का भी होता ,आँख और कान भी रोज़ेदार होतें हैं।

ठीक कहतें हैं प्रोफ़ेसर अख्तरुल वासे साहिब -रोज़ा जुबान का भी होता ,आँख और कान भी रोज़ेदार  होतें हैं। नवरात्र हों या रोज़े (रमादान की अवधि )शरीर से विषाक्त पदार्थ निकाल बाहर करने का काम भी करते हैं ताकि शेष साल  भर शरीर के प्रमुख अंग अपनी पूरी क्षमता से काम करते रहें। सार्स -कोरोना -वायरस -दो आलमी महारोग के इस आपात -काल  में जबकि कई योद्धाओं को  निशाने पे लिया जा रहा है तमाम कौमें -हिन्दू ,सिख, ईसाई, पारसी जैनी ,बौद्ध ख्याल रखें आँख अपराध  न कर पाए ,आपराधिक  न होने पाए। कान- अजान आरती पर ध्यान दें ,जुबान गुड़ हो जाए। परस्पर जुड़ाव बना रहे भौतिक दूरी रहे ,परस्पर दिलोदिमाग से थोड़ा और करीब हो जाएं। मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे काबा -मदीना और बेत -अल मकदीस जबकि लोकडाउन का तहे दिल से पालन कर रहें हैं हमसे कोई गलती न हो जाए। नभाटा ने आलेख "सबकी बेहतरी की दुआ प्रकाशित करके और ज़नाब प्रोफ़ेसर साहब ने यह प्रकाशन के लिए सबके साथ सांझा करके इस दौर की एक बड़ी ज़रुरियात को पूरा किया है। कौमों को जोड़ने वाले ऐसे ही मौज़ूं लेख आज पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक हैं। बधाई न...

बुजुर्ग पेड़ों का आवाहन सुनिए :यही बचा सकते हैं आलमी गर्मी से

बुजुर्ग पेड़ों का आवाहन सुनिए -यही बचा सकते हैं आलमी गर्मी से हमारी पृथ्वी अम्मा के पूरे जीवन काल में वृक्षों का बड़ा महत्व रहा है और आइंदा भी  क़ायम रहेगा। कहीं ये स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी तो कहीं स्टेचू ऑफ़ यूनिटी बन खड़े हैं आकाश  की बुलंदियों को नापते हुए। ये कार्बन लेते हैं संग्रहण के लिए हमारे वायुमंडल से और प्रतिदान में हमें दे देते हैं प्राण वायु ऑक्सीजन। ऑक्सीजन की खपत करने वाले तमाम जीवों का यही आधार बनते हैं। बहुत गहरे तक जाती हैं धंसी होती हैं पृथ्वी की कोख में इनकी जड़ें। यहीं से इन जड़मूलों से ही अपने अपने -पादप राइज़ो-इसफिअर से पुष्टिकर तत्व ग्रहण करते हैं। पृथ्वी की कुल  सतह का लगभग एक तिहाई भाग तरुवर लिए हुए हैं हालांकि इसका समान वितरण नहीं है। वृक्ष अपने आगोश में ताने खड़े हैं -एक तनौबा ,एक किरीट या मुकुट। हमारे असली क्षत्रप हैं वृक्ष। वह कतरा जमीन  का जो किसी पादप की जड़ों के  इर्द गिर्द होता है ,और उनकी मौजूदगी और अमाल के बायस तब्दील हो जाता है। en.wikipedia.org विशेष :मूल परिवेश या कैम्पस ,राइजोस्फीयर ( rhizosphere ) मिट...