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अकर्म एवं भक्ति, SI-11, by shri Manish Dev ji (Maneshanand ji) Divya Srijan Samaaj

सन्दर्भ -सामिग्री :https://www.youtube.com/watch?v=otOjab3ALy4 जो अकर्म  में कर्म को और कर्म में अकर्म को देख लेता है बुद्धिमान वही है। भगवान् अर्जुन को अकर्म और कर्म के मर्म को समझाते हैं। कर्म जिसका फल हमें प्राप्त  होता है वह है और अकर्म  वह जिसका फल हमें प्राप्त नहीं होता है।   वह योगी सम्पूर्ण  कर्म करने वाला है जो इन दोनों के मर्म को समझ लेता है।  अर्जुन बहुत तरह के विचारों से युद्ध क्षेत्र में ग्रस्त है । युद्ध करूँ न करूँ।  सफलता पूर्वक  कर्म करना है तो इस रहस्य को जान ना ज़रूरी है। अकर्म  वह है -जिसका फल प्राप्त नहीं होता। जो कर्म अनैतिक है जिसे नहीं करना चाहिए वही विकर्म है।वह कर्म जो नहीं करना चाहिए जो निषेध है वह विकर्म है।  जिस दिन कर्म और अकर्म का भेद समझ आ जाएगा। मनुष्य का विवेक जागृत होगा उसी दिन भक्ति होगी।तब जब घोड़े वाला चश्मा हटेगा और उसके स्थान पर विवेक का चश्मा लगेगा।    भगवान् अर्जुन से कहते हैं :हे अर्जुन !तू कर्म अकर्म और विकर्म के महत्व को मर्म को जान तभी तेरे प्रश्नों का...

कर्म, अकर्म एवं विकर्म by Shri Manish Dev ji(Maneshanand ji), SI-10, Divya Srijan Samaaj

प्रकृति स्वयं कर्म परायण है। ये जीव जो प्रकृति के वश रहता है यह भी कर्म परायण है प्रकृति (इसके तीन गुण )जीव से कर्म करवा ही लेते है। भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को कर्म ,अकर्म और विकर्म का स्वरूप समझाते हुए कहते हैं -हे अर्जुन  कर्म क्या है और अकर्म क्या है इसे लेकर बड़े बड़े ग्यानी व्यामोह में फंसे रहते हैं। कर्मों की गति बड़ी गहन है।  किम कर्म किमकर्मेति कव्योअपयत्र मोहिता : |  तत् ते  कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यते अशुभात ||  कर्म के फल का स्वरूप कैसा होगा उसके हिसाब से कर्म को तीन भागों में बांटा जा रहा है : कर्म ,अकर्म ,विकर्म।  कर्म करने में नीयत के अनुसार फल मिलता है मंदिर में रहने वाला पुजारी पूजा अर्चना भगवान् को नहलाना आदि कर्म करता हुआ दिख सकता है लेकिन अगर उसकी नीयत कहीं और है भोग विलास में है तो उसका कर्म अकर्म हो जाएगा। इसी प्रकार एक नेता या समाज सेवी ऊपर से समाज सेवा  में संलग्न दिख सकता है लेकिन अगर उसकी नीयत वहां नहीं है सेवा में उसका मन नहीं है किसी और एषणा में  गुंथा है तो उसका कर्म भी अकर्म  हो ज...

प्रारब्ध-कर्म-Destiny- SI-8 by Shri Manish Dev ji (Divya Srijan Samaaj)

जीव नित्य ही कर्म शील है कर्म उससे होता ही रहता है और उसका फल भी उसे मिलता रहता है। वो कर्म जिनका फल हमें इस जीवन में ही रहते मिल जाता है वह सभी क्रियामाण कर्म है। लेकिन ऐसे बहुत सारे कर्म जिनका फल जीव को नहीं मिलता वह संचित अवस्था में चले जाते हैं ऐसा नहीं कि उनका फल नहीं मिलता। इस अवस्था में पक जाने के बाद इनका फल भी अवश्य ही मिलता है।  जो पहले से निश्चित किया हुआ है वह प्रारब्ध कर्म है। कौन कहाँ पैदा हुआ है वह उसका प्रारब्ध ही है। यहीं पर भाग्य की बात आ जाती है। भाग्य भी होता है। हमारे अपने संचित कर्म ही भाग्य का निर्माण करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है ,भाग्य ही सब कुछ है पुरुषार्थ कुछ नहीं है।  भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं अर्जुन तू क्षत्री (क्षत्रिय )है कर्म कर।अपना क्षात्र धर्म निभा। कर्मों में अधिकार है तेरा। मत चिंता कर क्या फल मिलना है। कर्म तो मनुष्य के अधिकार में होता ही होता है फल चाहे जैसा भी प्राप्त हो। कर्म करने की स्वतंत्रता खुल (खुल्ल )भगवान् ने सबको दे रखी है। लेकिन जब (संचित ) कर्मों का फल नहीं निकलता उसी से प्रारब्ध का जन्म होता है।...

मैं भी, मैं भी, मैं भी. #MeToo, #MeToo, #MeToo

अभिव्यक्त न होना आपको बे -चैन बनाये रहता है। कविता का उदय यही अभि-व्यक्ति  है।मेरे एक दार्शनिक मित्र कह रहे थे # Metoo अभियान से  किसी का भी भला नहीं हो रहा है न व्यक्ति का न परिवार समाज का न देश का न हमारी सामाजिक संस्थाओं का जो लिविंग टुगेदर और परस्त्री गमन की निरपराध वैधता  के भंवर में आ चुकीं हैं। ये चंद लोगों की सोची समझी  साज़िश है। हो सकता है वह ठीक कह रहे हों। अभी तो इस अभियान की बिस्मिल्ला ही है।हम निर्णय सुनाने वाले कौन होते हैं फिर अभिव्यक्त होने का अपना सुख है। भाव विरेचन है। भावशांति है। #Metoo  भाव शामक का काम कर रहा है। इसके एकाधिक पहलुओं पर ये ब्लॉग ध्यान आकर्षित करता है। सांझा कर रहा हूँ मैं इस ब्लॉग को : https://www.bbc.com/hindi/india-45900134 इमेज कॉपीरइट GETTY IMAGES मैं भी, मैं भी, मैं भी. #MeToo, #MeToo, #MeToo पिछले साल अक्टूबर में अमरीका से शुरू हुआ #MeToo अभियान जब भारत पहुँचा तो महिलाओं ने सोशल मीडिया पर अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के बारे में बताना शुरू किया. तब किसी को ये अंदाज़ा नहीं था कि भारत में भी #MeToo कैंपेन इतना बड़...